News India Live, Digital Desk : राजनीति में बयानबाज़ी का दौर हमेशा चलता रहता है, लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सीधा दिल पर लगती हैं या फिर एक नई बहस को जन्म दे देती हैं। हाल ही में एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर एक ऐसी बात कह दी, जिससे पूरी भाजपा आक्रामक हो गई है। ओवैसी ने कहा कि वो अपनी ज़िंदगी में भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर किसी ‘हिजाब पहनने वाली लड़की’ को बैठे देखना चाहते हैं।
बात सुनने में उनके समर्थकों के लिए काफी प्रेरणादायक लग सकती है, लेकिन भाजपा ने यहाँ एक ऐसा पेंच फंसाया है जिसने ओवैसी को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
बंडी संजय का वो जवाब जो अब चर्चा में है
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद बंडी संजय ने इस पर तंज कसते हुए जो कहा, उसे लोग काफी ‘रियल’ मान रहे हैं। उन्होंने ओवैसी से सीधा सवाल पूछा कि अगर आपको हिजाब या बुर्के में कोई प्रधानमंत्री देखनी है, तो क्यों न इस शुरुआत को अपने घर यानी अपनी पार्टी से शुरू किया जाए?
बंडी संजय का कहना था कि, “असदुद्दीन ओवैसी भाई, आप सालों से अपनी पार्टी के सर्वेसर्वा बने हुए हैं। अगर आपकी सोच महिलाओं को आगे बढ़ाने की है, तो अपनी पार्टी AIMIM का अगला अध्यक्ष किसी ऐसी महिला को बनाइए जो बुर्का पहनती हो। दूसरों को सलाह देने से पहले अपनी पार्टी में तो उदाहरण पेश कीजिए।”
पर्दे के पीछे की असल जंग
यह मामला सिर्फ़ एक हिजाब या पद का नहीं है। दरअसल, भाजपा यह साबित करना चाहती है कि विपक्षी दल अक्सर वोट बैंक के लिए ‘इमोशनल’ बातें करते हैं, लेकिन जब खुद की सत्ता या अधिकारों को बांटने की बात आती है, तो वे पीछे हट जाते हैं। बंडी संजय का तर्क है कि ओवैसी अपनी पार्टी में केवल पुरुषों का दबदबा बनाए रखना चाहते हैं और महिलाओं को सिर्फ वोट देने तक सीमित रखते हैं।
धार्मिक राजनीति और असल विकास का सवाल
वहीं, दूसरी ओर ओवैसी का कहना रहा है कि हिजाब पहनना किसी की निजी चॉइस है और संवैधानिक रूप से भारत का कोई भी नागरिक देश के शीर्ष पद तक पहुँच सकता है। लेकिन इस जुबानी जंग ने यह साफ़ कर दिया है कि आने वाले चुनावों में ‘पहचान की राजनीति’ और ‘समानता’ के नाम पर बड़े वार होने वाले हैं।
आगे क्या?
आम जनता के बीच भी अब ये सवाल उठने लगा है क्या सिर्फ़ बयान देना काफी है या फिर पार्टियों को सच में अपनी महिलाओं को बड़े ओहदों पर बिठाना चाहिए? भाजपा और AIMIM के बीच की ये जंग फ़िलहाल शांत होती नहीं दिख रही, क्योंकि बंडी संजय ने ओवैसी की उस नस को दबाया है जहाँ से सवाल अब उनकी खुद की पार्टी के आंतरिक ढांचे पर उठ रहे हैं।
अंत में, चाहे हिजाब हो या साड़ी, मुद्दा यह होना चाहिए कि जो भी उस पद पर बैठे, वो देश को तरक्की के रास्ते पर ले जाए। लेकिन सियासत है साहिब, यहाँ मुद्दा तो ‘सिर की टोपी’ और ‘चेहरे के पर्दे’ पर ही आकर रुकता है।
The Journalist Express – ताज़ा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज़ और सरकारी योजनाएं Breaking News, Government Schemes & Updates