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शशि थरूर का बीजेपी पर तीखा तंज ,जिस नींव पर आज खड़े हो, वो नेहरू ने ही बनाई थी

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News India Live, Digital Desk: आजकल राजनीति का एक नया ट्रेंड चल पड़ा है किसी भी वर्तमान समस्या के लिए अतीत को ज़िम्मेदार ठहरा देना। आपने अक्सर भाषणों में सुना होगा कि “नेहरू ने यह गलती की” या “70 सालों में कुछ नहीं हुआ”। शशि थरूर इसी सोच पर सवाल उठा रहे हैं।

नेहरू: सिर्फ एक नाम नहीं, एक संस्था (Institution)
थरूर का कहना है कि आप नेहरू से असहमत हो सकते हैं, उनकी कुछ नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन उन्हें इतिहास से मिटाना या छोटा दिखाना नामुमकिन है। उनका तर्क है कि आज हम जिस ‘डिजिटल इंडिया’ या ‘स्पेस सुपरपावर’ होने का गर्व करते हैं, उसकी नींव उन संस्थानों (जैसे IIT, AIIMS, ISRO) में है जो नेहरू के विजन का हिस्सा थे।

बीजेपी की नीतियों पर थरूर का ‘लॉजिक’
थरूर ने बीजेपी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज की सरकार सिर्फ योजनाओं के नाम बदलने और पुरानी चीजों को नए पैकेट में पेश करने पर जोर दे रही है। उनका इशारा इस बात की तरफ था कि सिर्फ इमारतों के नाम बदलने या नेहरू की प्रतिमाओं को हटाने से देश आगे नहीं बढ़ता, बल्कि उन लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने से बढ़ता है जिनकी नींव आजादी के बाद रखी गई थी।

तनाव की असली वजह?
थरूर अक्सर अपनी किताबों और चर्चाओं में यह बात कहते आए हैं कि बीजेपी एक “हिंदू राष्ट्र” की कल्पना पर काम कर रही है, जबकि नेहरू का ‘इंडिया’ समावेशी (Inclusive) था। उनके हिसाब से आज की नीतियों में संस्थानों की स्वायत्तता (Autonomy) खत्म हो रही है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।

आम नागरिक के लिए ये चर्चा क्यों जरूरी है?
अक्सर हम इन बहसों को पार्टीबाजी समझकर छोड़ देते हैं। लेकिन जैसा कि थरूर कहते हैं, यह लड़ाई सिर्फ दो पार्टियों की नहीं, बल्कि देश के भविष्य और उसकी आत्मा को समझने की है। क्या हम सिर्फ आलोचनाओं के सहारे नया भारत बनाएंगे, या हम अपने इतिहास की अच्छाइयों को साथ लेकर चलेंगे?

शशि थरूर का यह बयान दरअसल हमें याद दिलाता है कि इतिहास में किसी की भूमिका को कमतर आंकना आसान है, लेकिन उस जैसी विरासत खड़ी करना बहुत कठिन। अब देखना यह है कि बीजेपी इस बौद्धिक चुनौती का क्या जवाब देती है।

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