
News India Live, Digital Desk : हिंदू पंचांग के अनुसार, तिथियों का घटना-बढ़ना अक्सर हमें उलझन में डाल देता है। माघ महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी यानी ‘षटतिला एकादशी’ को लेकर भी इस बार कुछ ऐसा ही हो रहा है। 13 जनवरी की शाम से ही एकादशी तिथि शुरू हो रही है, लेकिन शास्त्र और विद्वानों का मानना है कि ‘उदया तिथि’ (सूर्य उदय के समय वाली तिथि) का मान ही श्रेष्ठ होता है।व्रत कब रखें: 13 जनवरी या 14 जनवरी?देखा जाए तो एकादशी तिथि 13 जनवरी की शाम को लग रही है और यह 14 जनवरी की दोपहर तक रहेगी। सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार, जिस दिन सूर्योदय के समय जो तिथि होती है, उसी दिन व्रत रखा जाता है। इस हिसाब से 14 जनवरी 2026 (बुधवार) को व्रत रखना सबसे फलदायी होगा। इसी दिन श्रद्धालु पूरे नियम-धर्म के साथ भगवान विष्णु की आराधना करेंगे।षटतिला एकादशी ही नाम क्यों?इस एकादशी के नाम में ही इसका अर्थ छुपा है। ‘षट’ का मतलब है छह और ‘तिल’ यानी काले या सफेद तिल। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन तिल का 6 अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल करना ज़रूरी होता है। माना जाता है कि ऐसा करने से अनजाने में हुए पाप कट जाते हैं और जीवन में समृद्धि आती है।ये हैं तिल के वो 6 उपयोग:तिल के पानी से नहाना।शरीर पर तिल का उबटन लगाना।तिल से भगवान का पूजन और हवन करना।पितरों का तिल से तर्पण करना।तिल का दान करना।तिल से बना फलाहार ग्रहण करना।पारण का समय क्यों है महत्वपूर्ण?किसी भी एकादशी व्रत का फल तभी पूरा मिलता है जब उसका समय पर पारण (व्रत खोलना) किया जाए। 14 जनवरी को व्रत रखने वाले लोगों के लिए पारण का शुभ समय 15 जनवरी की सुबह होगा। कोशिश करें कि पारण के समय सात्विक भोजन करें और चावल का सेवन कर सकते हैं (क्योंकि एकादशी के दिन चावल मना होते हैं, पर पारण में इनका महत्व है)।आज के समय में इसकी अहमियतआज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर अपनी जड़ों और प्रकृति से दूर हो जाते हैं। ये व्रत हमें न सिर्फ आध्यात्मिक शक्ति देते हैं, बल्कि आयुर्वेद की दृष्टि से भी सर्दियों में तिल का उपयोग हमें सेहतमंद बनाए रखने में मदद करता है। माघ की ठंड में तिल और जल का यह संतुलन शरीर और मन, दोनों के लिए औषधि का काम करता है।अगर आप इस दिन किसी ज़रूरतमंद को तिल और गर्म कपड़ों का दान करते हैं, तो वह इस पूजा का सबसे बड़ा हिस्सा माना जाता है। आखिर भक्ति का असली मतलब ‘सेवा’ ही तो है।
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