News India Live, Digital Desk : भारत में आरक्षण हमेशा से एक ऐसा विषय रहा है जिस पर हर घर और हर गली में चर्चा होती है। लेकिन पिछले कुछ समय से ‘SC-ST आरक्षण’ को लेकर एक नई और गहरी बहस छिड़ी है यह बहस है ‘क्रीमी लेयर’ यानी ‘मलाईदार परत’ की। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है और उनसे इस मुद्दे पर उनका पक्ष मांगा है।
सीधी भाषा में समझें तो यह पूरा मामला यह देखने का है कि क्या दलितों और आदिवासियों में जो लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत आगे बढ़ चुके हैं, उन्हें मिलने वाले आरक्षण को कम करके उन लोगों तक पहुँचाया जाना चाहिए जो आज भी बिल्कुल पीछे और वंचित रह गए हैं?
क्यों शुरू हुई यह नई हलचल?
इस मामले की जड़ें सुप्रीम कोर्ट की सात जजों वाली संविधान पीठ के उस पिछले फैसले में हैं, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि राज्यों के पास अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के भीतर ‘उप-वर्गीकरण’ (Sub-classification) करने का अधिकार है। इसी फैसले के बाद यह सवाल उठा कि क्या अब ओबीसी की तरह ही SC-ST वर्ग में भी उन संपन्न परिवारों को बाहर किया जाना चाहिए जिन्होंने पीढ़ियों से आरक्षण का लाभ ले लिया है?
कोर्ट ने अब सरकारों से पूछा है कि इस दिशा में उनका क्या रोडमैप है।
किसका होगा फायदा और किसका नुकसान?
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम को लेकर दो तरह के नजरिए हैं:
- समानता का तर्क: कई लोगों का मानना है कि SC-ST समाज के भीतर भी एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो आज तक किसी भी योजना का लाभ नहीं ले पाया क्योंकि गिने-चुने समृद्ध परिवार ही सारी नौकरियां और सीटें ले जाते हैं। उनके लिए यह ‘असली सामाजिक न्याय’ है।
- पहिचान और संघर्ष का तर्क: वहीं दूसरी ओर, कुछ संगठन और नेता इस विचार के खिलाफ हैं। उनका तर्क है कि SC-ST आरक्षण सिर्फ गरीबी मिटाने का प्रोग्राम नहीं है, बल्कि यह सदियों के भेदभाव के खिलाफ ‘प्रतिनिधित्व’ की लड़ाई है। उन्हें डर है कि क्रीमी लेयर आने से यह समुदाय टुकड़ों में बंट जाएगा।
सरकारों की मुश्किलें
राजनीतिक रूप से यह किसी भी सरकार के लिए ‘कंटेंशियस’ या विवादास्पद मुद्दा है। सरकारों को कोर्ट को यह बताना होगा कि क्या वे वाकई इस मलाईदार परत को हटाने का मन बना चुकी हैं या नहीं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती यह बताती है कि अब सिर्फ़ वादों से काम नहीं चलेगा, एक ठोस कानूनी ढांचा तैयार करना होगा।
आगे की राह क्या है?
नोटिस जारी होने का मतलब यह है कि अब गेंद सरकारों के पाले में है। अगर कोर्ट ने इस पर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए, तो आने वाले समय में कॉलेज एडमिशन और सरकारी नौकरियों में आवेदन के तरीके बदल सकते हैं। इससे सबसे ज़्यादा असर उन युवाओं पर पड़ेगा जो संपन्न परिवारों से आते हैं और इस श्रेणी में आरक्षण का लाभ ले रहे हैं।
अंत में, यह सिर्फ़ कागजों का फेर नहीं है। यह हमारे लोकतंत्र के उस बुनियादी वादे की परीक्षा है जहाँ कहा गया था कि विकास की कतार में सबसे आखिरी में खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुँचना चाहिए।
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